Thursday, May 21, 2015

तिरंगा पाकिस्तान में

अरविन्द रंजन दास के द्वारा निर्देशन, संवाद और स्क्रीनप्ले से बनी फ़िल्म "तिरंगा पाकिस्तान में" मानव हृदय में उत्पन्न उन विकारों को कम करने में सहायक होगा जो हिंदुस्तान और पाकिस्तान को एक अच्छे पड़ोसी मुल्क़ बनने में व्यवधान है।
       अपने प्रस्तुति के अंदाज से फ़िल्म को सिर्फ मनोरंजक या देशभक्ति न बनाके यादगार और ग्रहणीय बना दिए है। फ़िल्म को स्नेहदात्री और NSI के बैनर तले पूरा किया गया है। आर्यन जी , शांडिल्य ईशान, नेहाश्री, आंनद मोहन, मंटु लाल संजना शाह जैसे बड़े दिग्ग्ज फ़नकार हैँ तो दिव्यराज , चंदनीराज, पुष्पराज गुंजन जैसे नए चेहरे भी मौजूद है।
चलचित्रकार रणजीत जी के करिश्माई छायांकन ने फ़िल्म को खूबसूरत बना दिया है।
    भाईचारे और मित्रवत तरीके से बन रही इस फ़िल्म को ईश्वर कामयाबी प्रदान करे।

Saturday, July 13, 2013

आओ रोटी सेंकें

आओ रोटी सेंकें .....
आप सोच रहे होंगे कि मै ये क्या कह रहा हूं . जी बिल्कुल सही कह रहा हूँ . उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा आई, मतलब चूल्हा मिल गया। लोग मर गए,,,, लो जी आग भी तैयार ....बस अब सारे नेता और छुटभईये नेता आ जाओ ....अपनी अपनी रोटी सेंको . थोड़ा बुरा लग रहा होगा . अजी थोड़ा क्या पूरा बुरा लगा होगा. खबरिया चैनल वाले भी कुछ रोटी सेंक लेंगे . कुछ फेसबूकेर भी रोटी सेंकने की कोशिश करेंगे . पार्टी कोई भी हो ......कुछ भी करेंगे तो उन्हें नाम चाहिए , लोकप्रियता चाहिए , 
जब सामान बाँटने , माफ़ करना .......मदद करने जायंगे तो पोस्टर लगा के जायेंगे . लेकिन हम तो ऐसे है जो घर में खुद को तो बंद कर ही रखा था अब अपनी जमीर और स्वतंत्र सोच को भी किसी अलादीन के चिराग में बंद कर दिया है. जब कोई धिसेगा तो तो धुंए के साथ बहार आयेगा. अरे प्रभु उठो और सोचो , किसे आप अपना मालिक बना रहे हो. नोट के चोट पर जब वोट जायेगा तो कोट तो होगा ही . आपके हमारे पैसे से ये जाली नोट के जैसे जाली देशभक्त और जाली समाजसेवक बर्वाद कर रहे है. अभी भी सिर्फ आटा  गुंथा गया है , रोटी मत सेंकने दो. 
वर्ना ये सब तो कह ही रहे है ,,,,,,,जिन्दा मुर्दा सो रहा है. सोये में अगर मर गया तो अति सुन्दर. तो प्रभु कुछ तो करना होगा. राम कृष्णा या बुद्ध आयेंगे तो बस आप या मेरे जैसे ही होंगे . पर होंगे तो हम ही . तो फिर इंतजार क्या ? जागो और जरा सोचो .............
नालंदा खुला विश्वविद्यालय 
दूसरा वर्ष 
पुष्पराज गुंजन 
bjmc 

Tuesday, July 31, 2012

मंहगाई और भ्रष्टाचार

मुद्दे का मुद्दा बनाकर फलूदा निकाल देने की कला भारतीयों में जन्मजात होता है. इस साल मीडिया ने बहुत कुछ नए और जलते घटनाक्रम को दिखाया. कभी कलमाडी कभी अन्ना कभी ,,,,,,,,पर परिणाम कुछ सामने नहीं आया! पानी की बोतल मंहगी हुई किसी ने कुछ नहीं बोला. पर दाल चावल, आटा नमक तो मंहगाई आ गई. क्यों भाई ? किसान को भी तो अमीर होने दो. सारे के सारे तनखाह बढ़ावा लेते हो पर किसान तो गरीब होने के किये ही बना है ना. वैसे भी विकसित होने की निशानी है मंहगाई. फूस के घर तो सस्ता होता है. पर फ्लेट और बिल्डिंग तो मंहगे होंगे ही. परन्तु भ्रष्टाचार का क्या करें ? अमीर और अमीर बनने के लिए इस दवाई का इस्तेमाल करता है , गरीब अमीर होने लिए! तो फिर क्या जंतर मंतर में जाने से कोई फायदा है?  नींव रखनी होगी. भ्रष्टाचारियों की खेत से भ्रष्टाचार को खतम करने के लिए जमीन पर नई फसल  उगानी होगी. पुराने घुन लगे इस फसल को तो एक बार खाना होगा या फिर फेकना या समाप्त करना. मतलब गरम मिजाजी होकर जान मर कर . पर मरने से मारने वाला सब भ्रष्ट है. जरा सोचो ,,,,,,,ये मिटेगी कैसे ,,,,,क्या अन्ना बाबा जिंदा रहेंगे इस देश में भ्रष्टाचार को मिटा देखने के लिए? या नए पौध के रूप में दुबारा जन्म लेंगे? क्योकि खून में रचा बसा ये बीमारी इतनी जल्दी खतम होगी. पहल ठीक है! पर बहुत हद तक ठीक है ये कहना मुश्किल है.
मीडिया बिक गई. सरकार बिक गई. इमान बिक गया. तो बचा क्या.? कल के बच्चे हमें पूछेंगे तो हम उसे देंगे गन्दा और घटिया समाज .बड़े स्कूल में पढेँ या छोटे में पर असर तो समाज का पड़ेगा. तो फिर ????
जरा सोचो.........................
पुष्पराज गुंजन .
दूसरा वर्ष
BJMC
नालंदा खुला विश्वविद्यालय 

Sunday, April 22, 2012

धर्म और भारत

भारत में दो चीज़ें बड़ी आसानी से बिक जाती है.  एक है धर्म और दूसरा है सेक्स. सेक्स तो हर जगह बिकती है पर धर्म भारत में खुलेआम मंहगा और सस्ता बिकता है. बेचने वाले के नाम में नन्द और बाबा के साथ स्वामी लगा होता है. इसे बढ़ावा देने में आज के दौर का यश देवता मीडिया महाराज का बड़ा योगदान है. पहले ये बाबा को अपने फायदे के लिए सर्वोच्च शिखर पर बैठा देते है और फिर उनके पुराने जिन्दगी के बारे में खंगाल कर उनको रसातल में पहुंचा देते है. पैसा तो सबको चाहिए, कोई धर्म फैला कर तो कोई धर्म को बेच कर तो कोई धर्म को नीचा दिखा कर. पर ऐसा क्यों? किसी और देश में इतने न तो धर्म होते है न इतने धर्म के ठेकेदार. पर भारत में जन्म से मरण तक विभिन्न कार्यों को धर्म का रूप दे कर हमें धार्मिक बनाया जाता है. तो फिर धर्म का यह ठेका चलेगा ही.
किसी भी सभ्यता में ये ठेकेदार मिल जाते है. वक़्त के हिसाब से स्वरुप अलग अलग हो जाते है पर ख़तम नहीं होते. हर इन्सान कम मेहनत में ज्यादा पाना चाहता है. इस काम में मदद करते है ये बाबा. बाबा भगवान् के जमीनी मंत्री या संतरी है. आपके दर्द का फॉर्म भर कर उनके यहाँ पहुँचाने का काम इनके हिस्से में है. पर क्या ये काम होते भी है? कौन जाने? मै नास्तिक नहीं हूँ. मै भी प्रभु के सत्ता को मानता हूँ. पर प्रभु इतने आडम्बरों को करवाते है ये मालूम नहीं है. ईश्वर है.. उनके कार्य है ..पर उनके कार्य में ये बाबा क्या काम करते है? या तो हमें अपनी बातो में बहका कर अपना काम निपटाते है ? या फिर सही में सीधा सम्बन्ध रखते है? पर हकीकत क्या है.......? ये तो ?????///जरा सोचो .
                              पुष्पराज गुंजन

https://www.youtube.com/watch?v=c0nFDtJZ0Xw

Wednesday, December 28, 2011

बिहार कभी विश्व गुरु कहलाने का हक़दार था आज क्यों नहीं?

हरी अनंत हरी कथा अनंता की तरह बिहार का अस्तित्व से लेकर आज तक के बारे में बात करें तो एक  वेद  या ग्रन्थ का नीव रखा जा सकता है. पर क्या आज एक बिहारी को बिहारी होने का गर्व है? अगर हाँ तो किस किस को ? सोचो...........अर्थ , व्यापार, संस्कृति, धर्म , राजनीति, इत्यादि में बिहार और बिहारी ने विश्व को कई धरोहर दिए है. रामायण महाभारत जैसे महाकाव्य में बिहार का वर्णन ये सिद्ध करता है कि बिहारी और बिहार अपमान सहने के लिए नहीं बल्कि  समाज को एक नई दिशा देना होता है.
           जरा सोचो जिस सरजमीं पर भगवान बुद्ध, महावीर, गुरु गोविन्द सिंह, चाणक्य, सम्राट अशोक, वीर
कुँवर सिंह , माननीय राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद आदि जैसे धुरंधर पैदा लिए हों वहाँ के निवासी भला ज़िल्लत सहने के लिए बने हो।
https://www.youtube.com/watch?v=c0nFDtJZ0Xw

Friday, December 23, 2011

पत्रकारिता के इस दौर में किसको दोषी ठहराएँ

पत्रकारिता के कई रूप है- हर रूप में एक अनदेखा और अनसोचा मजा है. नारद मुनि के तम्बूरे से लेकर वेब या नेट तक का सफ़र सोच कर रोमांच सा हो जाता है. एक घटना, ज्ञान, या सुचना को एक जगह से कई जगहों तक जाना पत्रकारिता का गुण है. पर अगर ले जाने वाला माध्यम पत्र बेच बेच कर कार पर चढ़ता हो तो हम आप सभी अनुमान लगा सकते है की उस पत्रकारिता का क्या हस्र होता होगा.सच्चाई का झूठा दंभ भरने वाले इस पत्रकारिता को किसी की नज़र लग गई है. कोई  डायन  है जो इस सत्य के रूप को खा रहा है. आँख मूंद कर विश्वाश करने लायक पत्रकारिता को अब ग्रामीण परिवेश से लेकर शहरी परिवेश वाले सबके सब अविश्वास जाता रहे है.आखिर क्यों? कौन है वो हैवान जो किसी के मेहनत पर, किसी के साख पर, किसी के ईमान पर अपना काला स्याह खून की लीपापोती कर रहा है? और क्यों? सिर्फ नाम के लिए या फिर चंद सिक्को के लिए जो मरणोपरांत साथ नहीं जायेगा? ये कोई और नहीं ..........हम ...... है! हम .....हमारा भाई , आपका दोस्त आपका बेटा या बेटी हमारा  खून हमारे रिश्तेदार ....पर हम देखते है दुसरे को. दुसरो के दामन में झांकते है. पर अपना गिरेवान तक नज़र नहीं जा पाती. या फिर बाजारवाद से ग्रस्त वो मीडिया के स्कूल !!!!!! जो मोटी कीमत लेके जर्नलिज्म को जड़ता का आवरण पहनाते है.. पान के दुकानों की तरह हर नाके पर ,चौक पर स्कूल मिल जाते है.  किसको दोष दें? सबको पैसा चाहिए?मेरा मानना है की फिर पत्रकारिता को मत चुनो. अगर आप किसी पेशे को कलंकित कर रहे हो तो उस पेशे को छोड़ दो....आज मीडिया में लोग ग्लैमर के साथ ही साथ धाक ज़माने के लिए भी आते है.भारतीय लोकतंत्र के चारों स्तंभों में मीडिया एक अहम् भूमिका निभाता है. इतना जिम्मेदारी का काम गैर जिम्मेदार लोगो के हाथ में कैसे चला गया? और कब ? आजादी के पहले तो शायद ऐसा हस्र पत्रकारिता का तो नहीं था ! क्या आज़ाद भारत के लोग ऐसे हो गए? आजादी में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला पत्रकार या पत्रकारिता आज़ाद होते ही उन्मादी हो गया. वो जुनून वो जो देश और समाज की बात सोचता था , आज सिर्फ अपने शोहरत  और ऐश्वर्य के बारे में सोचता है.   . ..........
पैसा सबको चाहिए पर कुछ तो इंसाफ होना चाहिए पैसा के साथ. पैसा जिस काम के लिए ले रहे हो वही नहीं कर रहे , समाज सेवा काम लिया है तो कुछ तो करो ..

''पुष्पराज गुंजन ''