Tuesday, July 31, 2012

मंहगाई और भ्रष्टाचार

मुद्दे का मुद्दा बनाकर फलूदा निकाल देने की कला भारतीयों में जन्मजात होता है. इस साल मीडिया ने बहुत कुछ नए और जलते घटनाक्रम को दिखाया. कभी कलमाडी कभी अन्ना कभी ,,,,,,,,पर परिणाम कुछ सामने नहीं आया! पानी की बोतल मंहगी हुई किसी ने कुछ नहीं बोला. पर दाल चावल, आटा नमक तो मंहगाई आ गई. क्यों भाई ? किसान को भी तो अमीर होने दो. सारे के सारे तनखाह बढ़ावा लेते हो पर किसान तो गरीब होने के किये ही बना है ना. वैसे भी विकसित होने की निशानी है मंहगाई. फूस के घर तो सस्ता होता है. पर फ्लेट और बिल्डिंग तो मंहगे होंगे ही. परन्तु भ्रष्टाचार का क्या करें ? अमीर और अमीर बनने के लिए इस दवाई का इस्तेमाल करता है , गरीब अमीर होने लिए! तो फिर क्या जंतर मंतर में जाने से कोई फायदा है?  नींव रखनी होगी. भ्रष्टाचारियों की खेत से भ्रष्टाचार को खतम करने के लिए जमीन पर नई फसल  उगानी होगी. पुराने घुन लगे इस फसल को तो एक बार खाना होगा या फिर फेकना या समाप्त करना. मतलब गरम मिजाजी होकर जान मर कर . पर मरने से मारने वाला सब भ्रष्ट है. जरा सोचो ,,,,,,,ये मिटेगी कैसे ,,,,,क्या अन्ना बाबा जिंदा रहेंगे इस देश में भ्रष्टाचार को मिटा देखने के लिए? या नए पौध के रूप में दुबारा जन्म लेंगे? क्योकि खून में रचा बसा ये बीमारी इतनी जल्दी खतम होगी. पहल ठीक है! पर बहुत हद तक ठीक है ये कहना मुश्किल है.
मीडिया बिक गई. सरकार बिक गई. इमान बिक गया. तो बचा क्या.? कल के बच्चे हमें पूछेंगे तो हम उसे देंगे गन्दा और घटिया समाज .बड़े स्कूल में पढेँ या छोटे में पर असर तो समाज का पड़ेगा. तो फिर ????
जरा सोचो.........................
पुष्पराज गुंजन .
दूसरा वर्ष
BJMC
नालंदा खुला विश्वविद्यालय 

Sunday, April 22, 2012

धर्म और भारत

भारत में दो चीज़ें बड़ी आसानी से बिक जाती है.  एक है धर्म और दूसरा है सेक्स. सेक्स तो हर जगह बिकती है पर धर्म भारत में खुलेआम मंहगा और सस्ता बिकता है. बेचने वाले के नाम में नन्द और बाबा के साथ स्वामी लगा होता है. इसे बढ़ावा देने में आज के दौर का यश देवता मीडिया महाराज का बड़ा योगदान है. पहले ये बाबा को अपने फायदे के लिए सर्वोच्च शिखर पर बैठा देते है और फिर उनके पुराने जिन्दगी के बारे में खंगाल कर उनको रसातल में पहुंचा देते है. पैसा तो सबको चाहिए, कोई धर्म फैला कर तो कोई धर्म को बेच कर तो कोई धर्म को नीचा दिखा कर. पर ऐसा क्यों? किसी और देश में इतने न तो धर्म होते है न इतने धर्म के ठेकेदार. पर भारत में जन्म से मरण तक विभिन्न कार्यों को धर्म का रूप दे कर हमें धार्मिक बनाया जाता है. तो फिर धर्म का यह ठेका चलेगा ही.
किसी भी सभ्यता में ये ठेकेदार मिल जाते है. वक़्त के हिसाब से स्वरुप अलग अलग हो जाते है पर ख़तम नहीं होते. हर इन्सान कम मेहनत में ज्यादा पाना चाहता है. इस काम में मदद करते है ये बाबा. बाबा भगवान् के जमीनी मंत्री या संतरी है. आपके दर्द का फॉर्म भर कर उनके यहाँ पहुँचाने का काम इनके हिस्से में है. पर क्या ये काम होते भी है? कौन जाने? मै नास्तिक नहीं हूँ. मै भी प्रभु के सत्ता को मानता हूँ. पर प्रभु इतने आडम्बरों को करवाते है ये मालूम नहीं है. ईश्वर है.. उनके कार्य है ..पर उनके कार्य में ये बाबा क्या काम करते है? या तो हमें अपनी बातो में बहका कर अपना काम निपटाते है ? या फिर सही में सीधा सम्बन्ध रखते है? पर हकीकत क्या है.......? ये तो ?????///जरा सोचो .
                              पुष्पराज गुंजन

https://www.youtube.com/watch?v=c0nFDtJZ0Xw