Wednesday, December 28, 2011

बिहार कभी विश्व गुरु कहलाने का हक़दार था आज क्यों नहीं?

हरी अनंत हरी कथा अनंता की तरह बिहार का अस्तित्व से लेकर आज तक के बारे में बात करें तो एक  वेद  या ग्रन्थ का नीव रखा जा सकता है. पर क्या आज एक बिहारी को बिहारी होने का गर्व है? अगर हाँ तो किस किस को ? सोचो...........अर्थ , व्यापार, संस्कृति, धर्म , राजनीति, इत्यादि में बिहार और बिहारी ने विश्व को कई धरोहर दिए है. रामायण महाभारत जैसे महाकाव्य में बिहार का वर्णन ये सिद्ध करता है कि बिहारी और बिहार अपमान सहने के लिए नहीं बल्कि  समाज को एक नई दिशा देना होता है.
           जरा सोचो जिस सरजमीं पर भगवान बुद्ध, महावीर, गुरु गोविन्द सिंह, चाणक्य, सम्राट अशोक, वीर
कुँवर सिंह , माननीय राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद आदि जैसे धुरंधर पैदा लिए हों वहाँ के निवासी भला ज़िल्लत सहने के लिए बने हो।
https://www.youtube.com/watch?v=c0nFDtJZ0Xw

Friday, December 23, 2011

पत्रकारिता के इस दौर में किसको दोषी ठहराएँ

पत्रकारिता के कई रूप है- हर रूप में एक अनदेखा और अनसोचा मजा है. नारद मुनि के तम्बूरे से लेकर वेब या नेट तक का सफ़र सोच कर रोमांच सा हो जाता है. एक घटना, ज्ञान, या सुचना को एक जगह से कई जगहों तक जाना पत्रकारिता का गुण है. पर अगर ले जाने वाला माध्यम पत्र बेच बेच कर कार पर चढ़ता हो तो हम आप सभी अनुमान लगा सकते है की उस पत्रकारिता का क्या हस्र होता होगा.सच्चाई का झूठा दंभ भरने वाले इस पत्रकारिता को किसी की नज़र लग गई है. कोई  डायन  है जो इस सत्य के रूप को खा रहा है. आँख मूंद कर विश्वाश करने लायक पत्रकारिता को अब ग्रामीण परिवेश से लेकर शहरी परिवेश वाले सबके सब अविश्वास जाता रहे है.आखिर क्यों? कौन है वो हैवान जो किसी के मेहनत पर, किसी के साख पर, किसी के ईमान पर अपना काला स्याह खून की लीपापोती कर रहा है? और क्यों? सिर्फ नाम के लिए या फिर चंद सिक्को के लिए जो मरणोपरांत साथ नहीं जायेगा? ये कोई और नहीं ..........हम ...... है! हम .....हमारा भाई , आपका दोस्त आपका बेटा या बेटी हमारा  खून हमारे रिश्तेदार ....पर हम देखते है दुसरे को. दुसरो के दामन में झांकते है. पर अपना गिरेवान तक नज़र नहीं जा पाती. या फिर बाजारवाद से ग्रस्त वो मीडिया के स्कूल !!!!!! जो मोटी कीमत लेके जर्नलिज्म को जड़ता का आवरण पहनाते है.. पान के दुकानों की तरह हर नाके पर ,चौक पर स्कूल मिल जाते है.  किसको दोष दें? सबको पैसा चाहिए?मेरा मानना है की फिर पत्रकारिता को मत चुनो. अगर आप किसी पेशे को कलंकित कर रहे हो तो उस पेशे को छोड़ दो....आज मीडिया में लोग ग्लैमर के साथ ही साथ धाक ज़माने के लिए भी आते है.भारतीय लोकतंत्र के चारों स्तंभों में मीडिया एक अहम् भूमिका निभाता है. इतना जिम्मेदारी का काम गैर जिम्मेदार लोगो के हाथ में कैसे चला गया? और कब ? आजादी के पहले तो शायद ऐसा हस्र पत्रकारिता का तो नहीं था ! क्या आज़ाद भारत के लोग ऐसे हो गए? आजादी में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला पत्रकार या पत्रकारिता आज़ाद होते ही उन्मादी हो गया. वो जुनून वो जो देश और समाज की बात सोचता था , आज सिर्फ अपने शोहरत  और ऐश्वर्य के बारे में सोचता है.   . ..........
पैसा सबको चाहिए पर कुछ तो इंसाफ होना चाहिए पैसा के साथ. पैसा जिस काम के लिए ले रहे हो वही नहीं कर रहे , समाज सेवा काम लिया है तो कुछ तो करो ..

''पुष्पराज गुंजन ''